भ्रष्टाचार है - तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, कानून की अवहेलना, योग्यता के मुकाबले निजी पसंद को तरजीह देना, रिश्वत लेना, कामचोरी, अपने कर्तव्य का पालन न करना, सरकार में आज कल यही हो रहा है. बेशर्मी भी शर्मसार हो गई है अब तो.

Monday, February 22, 2010

वकालत खारिज, राजनीति शुरू

कपिल सिब्बल पहले वकील थे,
अब बन गए हैं राजनीतिबाज,
भूल गए हैं कानून,
प्राइवेट स्कूलों की फीस पर,
सरकार नहीं कर सकती रोकथाम,
पर अंधाधुंध फायदा नहीं,
क्या बात है जनाब आपकी,
चोर से कहें चोरी कर,
पर सब कुछ मत चुरा लेना.
जेब कतरे से कहें काट ले जेब,
पर कुछ नोट छोड़ देना.

Sunday, February 7, 2010

तरक्की

मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की की है.
कैसे?
पहले जब लोग मरते थे तब पता ही नहीं चलता था कि किस बीमारी से मरे.
और अब?
अब डाक्टर कुछ कुछ अनुमान लगा लेते हैं कि किस बीमारी से मरे.

Monday, February 1, 2010

बापू जीवित हैं

तीस जनवरी १९४८,
बापू का महाप्रयाण,
तीस जनवरी २०१०,
दिल्ली सरकार का विज्ञापन,
'बापू जीवित हैं'.
कहाँ रहते हैं वह?
मैं मिलना चाहता हूँ उनसे,
पूछना चाहता हूँ,
आप जीवित हैं अगर,
तब क्यों नहीं आते नजर?
सपने में बापू नजर आये,
बोले मैं जीवित होता हूँ,
हर वर्ष ऐसे विज्ञापन में,
फिर मर जाता हूँ,
अगले वर्ष जीवित होने के लिए,
ऐसे ही किसी विज्ञापन में,
और फिर मर जाता हूँ एक वर्ष के लिए.

Wednesday, January 27, 2010

दूसरों को नसीहत, खुद मादाम फजीहत

उन्होंने कहा कानून बनाओ,
अपराधी चुनाव न लड़ सकें,
कुछ ऐसा कर दिखाओ.
उन्होंने आज यह कहा,
मैं न जाने कब से कह रहा हूँ,
पर मैं एक आम आदमी हूँ,
वह उस पार्टी की मालकिन हैं,
जिसकी सरकार है इस देश में,
मेरी किसी ने न सुनी,
उनकी सब सुन रहे है,
पर यह कोई नहीं सोचता,
कि वह कानून बना सकती हैं,
पर बनाती नहीं बस बात करती हैं,
कम से कम यह तो कर सकती हैं,
अपनी पार्टी में सभी अपराधियों को,
पार्टी से निकाल सकती हैं,
पर वह ऐसा करेंगी नहीं,
वह आम आदमी नहीं हैं,
वह एक राजनीतिबाज हैं,
बचपन में पढी थी एक कहावत,
दूसरों को नसीहत,
खुद मादाम फजीहत.

Sunday, January 17, 2010

रामपुर का डाक्टर

उत्तर प्रदेश में रामपुर,
रामपुर में एक डाक्टर,
डाक्टर का एक मरीज,
मरीज का रक्त चाप गिर गया,
सुगर लेबल भी कम हो गया,
सब लोग घबड़ाए,
पर डाक्टर जी मुस्कुराए,
मरीज को ले चलो बरेली,
करूंगा में एंजियोग्राफी,
दस हजार का खर्चा आएगा,
सब ठीक हो जाएगा.

मरीज अड़ गया दिल्ली जाऊँगा,
जिस डाक्टर ने बाई पास किया था,
उसी से एंजियोग्राफी करवाऊंगा,
सुन कर डाक्टर उदास हो गए,
बोले में उन्हें चिट्ठी लिख देता हूँ,
मन में सोचा दस हजार नहीं,
कुछ कमीशन ही सही,
कडकडाती सर्दी, घने कोहरे में,
सात घंटे के सफ़र के बाद,
मरीज दिल्ली पहुंचा,
पहले तो डाक्टर ने मना किया,
कोई जरूरत नहीं वह बोला,
पर मरीज घबड़ा रहा था सो मान गया,
टेस्ट हुआ, सब ठीक निकला,
मरीज की जान में जान आई,
पर बीस हजार के नीचे आ गया,
वाह रे डाक्टर, वाह री डाक्टरी,
सेवा का धंधा,
बन गया पैसे कमाने की मशीन.

Friday, January 15, 2010

तीन सवाल ???

पडोसी देश ने,
हड़प ली जमीन हमारी,
इंच-इंच करके,
पर सरकार सोती रही,
कुछ न कर पाई,
न ही कुछ करना चाहा,
क्या देश सुरक्षित है,
ऐसी सरकार के हाथों में?

एक लेखक की किताब,
खूब बिकी, खूब बिकी,
परम्परा के अनुसार,
उन्होंने एक लेख में लिखा,
कश्मीर दे दो पाकिस्तान को,
किसी ने कुछ नहीं कहा,
न कोई फतवा,
न ही कोई भर्त्सना,
क्या देश सुरक्षित है,
ऐसे लेख्कों के हाथों में?

मैं दिल्ली में रहता हूँ,
बड़ा अजीब लगता है,
प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री,
अक्सर बयान देते हैं,
दिल्ली को बनायेंगे,
सबसे खूबसूरत शहर,
मेरी कालोनी के पार्क में,
घुमते हैं कुत्ते और सुवर,
क्या मेरा शहर सुरक्षित है,
ऐसे नेताओं के हाथों में?

Friday, January 8, 2010

ममता दी की झटका गाड़ी

ममता दी की झटका गाड़ी,
शताब्दी एक्सप्रेस उसका नाम,
दिल्ली कालका के बीच चलती,
हर रोज सुबह और शाम.

पहला झटका दिया सुबह जब,
प्लेटफार्म से निकली बाहर,
सारे झटके गिन नहीं पाया,
उतर गया चंडीगढ़ जाकर.

सुपर फास्ट कहलाती है वह,
पर चलती कछुए की चाल,
कभी तेज चलते नहीं देखा,
मर्जी जहाँ वहीं रुक जाती.

रुकती है तो झटका देती,
चलती है तो झटका देती,
चलते-चलते झटका देती,
रुलते-रुकते झटका देती.

लालू जी की झटका गाड़ी,
अब है ममता दी की गाड़ी,
लालू बदल गए ममता में,
पर नहीं बदले झटके इसके.

ममता दी की झटका गाड़ी,
ममता दी की झटका गाड़ी.

Tuesday, December 29, 2009

वह सीएम् की कुर्सी पर ऊंघ रही हैं

प्रेस पार्टी ख़बरें सूंघ रही थी,
मुख्य मंत्री दफ्तर में ऊंघ रही थी,
जनता ने तीसरी बार जिताया,
कारण आज तक समझ नहीं आया,
खुद मैंने खुद को वोट नहीं डाला,
पर जनता मुझे ही वोट डाल गई,
क्या जनता बेबकूफ है?
या कोई साजिश कर रही है?
घर और बाहर कोई सुरक्षित नहीं,
चोर और पुलिस में कोई अंतर नहीं,
सड़कों में गड्ढे या गड्ढों में सड़कें?
मौत बांटती ब्लू लाइन बसें,
पानी तो बिजली नहीं,
बिजली तो पानी नहीं,
अक्सर दोनों ही नहीं,
कुछ भी तो सही नहीं,
बस एक ही बात सही है,
वह सीएम् की कुर्सी पर ऊंघ रही हैं,
प्रेस पार्टी ख़बरें सूंघ रही है.

Thursday, December 17, 2009

चोर और मंत्री

माननीय धनिया राम,
इस बार मंत्री बन ही गए,
मीडिया वाले उन के घर आये,
उन का इंटरव्यू लिया,
अंत में एक सवाल पूछा,
किस का हाथ है?
आपकी इस सफलता के पीछे,
धनिया जी मुस्कुराए,
अपनी पत्नी की और इशारा किया,
सही है सब ने कहा,
हर सफल आदमी के पीछे,
होती है एक औरत.

केमरा घूम गया,
श्रीमती धनिया राम की तरफ,
वह मुस्कुराई और बोली,
धनिया जी एक चोर थे,
अक्सर पकडे जाते,
जम कर ठुकाई होती,
मेरे मन में एक ख़याल आया,
मैंने धनिया जी को समझाया,
चुनाव क्यों नहीं लड़ते,
अगर जीत गए और मंत्री बन गए,
तो रोज चोरी करना देश के धन की,
जो पुलिसवाले आज ठोकते हैं,
तब सलाम करेंगे,
आज दस नम्बरी कहलाते हो,
तब माननीय कहलाओगे,
इन्होनें मेरी बात मान मान ली,
आज पुलिस विभाग के मंत्री हैं,
पुलिस और चोर,
दोनों भेंट चढाते हैं,
मांननीय धनिया राम जी
सारे देश में पूजे जाते हैं,
पहले मात्र चोर थे,
अब चोर मंत्री हैं.

Thursday, December 10, 2009

नया प्रदेश और दहेज़

सुना है नेताजी अनशन पर बैठ गए हैं,
हाँ आपने सही सुना है,
पर क्यों यह नहीं पता चला,
अरे सबको पता है, आपको नहीं,
एक नया प्रदेश बनाओ,
यह मांग है उनकी,
नया प्रदेश, पर कहाँ, किस नाम से?
कहीं भी, किसी भी नाम से,
बस उन्हें नया प्रदेश चाहिए,
पर क्यों, कुछ तो कारण होगा,
उनके होने वाले दामाद की जिद है,
शादी में सीएम् की कुर्सी चाहिए,
और कुर्सी कोई खाली है नहीं,
नया प्रदेश बनेगा,
नई कुर्सी बनेगी,
उस पर दामाद बैठेगा.

Monday, December 7, 2009

प्रेम का नया दुश्मन

एक सुवर को मुर्गी से प्रेम हो गया,
मुर्गी भी सुवर को प्रेम करने लगी,
पर यह प्रेम पसंद नहीं आया,
दोनों के घरवालों को,
सुवर और मुर्गी का प्रेम,
न देखा कभी न सुना,
समझाया फिर धमकाया,
पर प्रेम अँधा होता है,
दोनों नहीं माने,
घर छोड़कर भाग गए,
रहने लगे लिव-इन रिलेशनशिप में,
एक रात सुवर ने चुम्बन लिया मुर्गी का,
सुबह दोनों मृत पाए गए,
डाक्टरी जांच से पता चला,
सुवर मरा बर्ड फ़्लू से,
मुर्गी मरी स्वाईन फ़्लू से.

Monday, October 19, 2009

कामनवेल्थ (साझा धन) खेल स्पर्धा शुरू

साझा धन खेल स्पर्धा,
हो गई समय से पहले शुरू,
कल्मादी, हूपर, फेनेल,
जुट गए मल्ल युद्ध में,
दुसरे को नीचा दिखाने की,
खुद को ऊंचा साबित करने की,
अघोषित प्रतियोगिता का स्वर्ण पदक,
कौन जीतेगा?
कोई भी जीते,
क्या फर्क पड़ता है,
खेल तो हार गए.

Friday, October 9, 2009

निद्रा देवी की कृपा से कामनवेल्थ गेम्स बच गए

आज पार्क में शर्मा जी बहुत खुश थे. लोगों के पूछने पर अपने हाथ में लिया अखवार हिलाते थे और कहते थे, 'आने दो वर्मा को, आज माफ़ी न मंगवाई तो मेरा नाम नहीं'.
किसी की कुछ समझ में नहीं आया तो मिश्रा जी बोले, 'भई आ जाने दो वर्मा जी को सब पता चल जायगा'.
कुछ देर में वर्मा जी आ गए. शर्मा जी ने अखवार उनकी तरफ बढाया और बोले' 'लो पढो इसे और कुछ शर्म बाकी है तो माफ़ी मांगो'. वर्मा जी ने खबर पढ़ी और बोले, 'क्या है यह और किस बात की माफ़ी?'
'अच्छा किस बात की माफ़ी? अरे शर्म करो, भूल गए जब में किसी लेक्चर या प्रेजेंटेशन में सोता हूँ तो मेरा मजाक उडाते हो, बॉस से चुगली लगाते हो और मुझे डांट खिलवाते हो. अब कामनवेल्थ गेम्स फेडरेशन का प्रेसिडेंट प्रेजेंटेशन में सो रहा है तो पूछ रहे हो क्या है यह और किस बात की माफ़ी?'
वर्मा जी से अखवार ले कर हम सबने खबर पढ़ी तो सारी बात समझ में आई.
मिश्रा जी बोले, 'भई वर्मा जी यह बात तो गलत है, शर्मा जी का मजाक उड़ाना, उनकी चुगली करना और बॉस से डांट खिलवाना. अरे भई लेक्चर और प्रेजेंटेशन में सोने वाले तो महान लोग होते हैं. क्या तुमने लोक सभा और विधान सभा में
मंत्रिओं को सोते नहीं देखा? शर्मा जी महान हैं तभी तो सोते हैं,'
सब ने मिश्रा जी की बात का समर्थन किया. वर्मा जी को शर्मा जी से माफ़ी मांगनी पडी.
महान शर्मा जी का सब ने तालियों से अभिनन्दन किया,
मिश्र जी ने कहा, 'अब यह सोते हुए प्रेसिडेंट खेलों की तैयारियों पर पूरा संतोष प्रकट करेंगे. यह भी खुश, भारत सरकार भी खुश, कामनवेल्थ में से अपने-अपने हिस्से की वेल्थ लेने वाले भी खुश. सोचो जरा, अगर यह सोते नहीं तो गए थे कामनवेल्थ खेल दिल्ली से'.

Sunday, October 4, 2009

अच्छा बापू अब अगले साल याद करेंगे तुम्हें

मेरा एक दोस्त जो सरकारी बाबू है इस बार बापू से बहुत खुश था. बापू ने इस साल शुक्रवार को पैदा होकर बहुत अच्छा किया, तीन छुट्टियां बन गईं और वह मसूरी निकल लिया. और भी बहुत सारे लोग बापू से इस बात पर खुश होते हैं कि वह हर साल २ अक्टूबर को पैदा होते हैं और उनकी जेब गरम कर जाते हैं. सरकार ने जनता का करोडों रुपया पानी की तरह बहा दिया विज्ञापनों में. यह बहता पानी कुछ तो गया नेताओं और बाबुओं की जेब में, कुछ गया अखवार वालों की जेब में, और कुछ गया ...... अरे भाई किसी न किसी जेब में तो गया होगा. कुछ सरकारों ने बापू के नाम पर गरीब जनता के लिए कुछ योजनाओं की घोषणा कर दी. अब बापू के अगले जन्म दिन तक सब मजे करेंगे.

एक नवोदित लेखक ने बापू को चिट्ठी लिख डाली कि बापू एक दिन के लिए आ जाओ और ६० सालों में जो बिगडा है उसे ठीक कर जाओ. साथ ही धमकी भी दे दी कि अगर नहीं आये तो हम खुद ठीक कर लेंगे. एक नए मंत्री ने ट्वीट कर दी कि बापू के जन्म दिन पर सब को काम करना चाहिए. इस पर कुछ राजनीतिबाजों ने आदतन बयानबाजी कर डाली. और भी बहुत से लोगों ने कुछ किया होगा और कुछ ने कुछ नहीं भी किया होगा. मतलब यह कि बापू का जन्म दिन आया और निकल गया. कुछ को पता चला और कुछ को नहीं पता चला. जिन को पता चला उन्होंने क्या उखाड़ लिया और जिन्हें नहीं पता चला वह क्या उखाड़ लेते अगर पता चल जाता. हर साल की तरह जो होता है वह इस साल भी हुआ और अगले साल भी होगा.

आज तक कोई बापू को समझ नहीं पाया. सब ने उन्हें अपने हिसाब से समझा. वह जैसे थे बैसा किसी ने नहीं समझा. बापू हम सबकी तरह एक आम इंसान थे. वह कोई मसीहा नहीं थे. बस कुछ आम इंसान अपने व्यवहार में दूसरे आम इंसानों से ऊपर उठ जाते हैं. बापू एक ऐसे ही आम इंसान थे. पर कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए उन्हें मसीहा का नाम दे दिया, राष्ट्रपिता कह दिया, और इस ब्रांडिंग का पेटेंट अपने नाम कर लिया. आज तक उनकी पीढियां इस ब्रांडिंग का फायदा उठा रही हैं. वास्तविकता तो यह है कि बापू के आदर्शों का सबसे ज्यादा मजाक इन्हीं लोगों ने उड़ाया. यह बापू की सबसे बड़ी कमजोरी थी कि वह सही और गलत आदमी में भेद नहीं कर पाए. सब उन्हें प्यार करते थे, उनका आदर करते थे, और इसी प्यार और आदर का गलत इस्तेमाल करके बापू ने इन गलत लोगों को इस देश और जनता पर थोप दिया.

बापू की सबसे बड़ी खासियत थी उनका मानवीय संबंधों के प्रति आदर. मेरे विचार से यह एक खासियत बापू को एक आम इंसान से बहुत ऊपर उठा ले गई. अफ़सोस की बात यह है कि उनकी इसी खासियत को लोग समझ नहीं पाए. बापू सबसे प्रेम करते थे. उन्होंने कभी किसी से नफरत नहीं की. यही प्रेम उनके अहिंसा के सिद्धांत का आधार था. जो इंसान प्रेम करता है वह हिंसक हो ही नहीं सकता. आज भारतीय समाज में मानवीय संबंधों के प्रति जो अनादर है उसे दूर किये बिना बापू का जन्म दिन मनाने का कोई मतलब नहीं है.

Friday, October 2, 2009

जनता का धन है किसका साझा धन?

वर्मा जी ने पूछा शर्मा जी से,
यह कामनवेल्थ क्या है?
अरे इतना भी नहीं जानते?
कामनवेल्थ यानी साझा धन,
वर्मा जी बुरा मान गए,
इतनी अंग्रेजी हिंदी आती है मुझे,
यह बताओ कहाँ है यह धन?
और किस किस में साझा है?
यार यह तो कभी सोचा नहीं,
हाँ अखवार भरे हैं इस बारे में,
कोई खेल होंगे २०१० में,
जिनका नाम है कामनवेल्थ गेम्स.

दोनों गए मिश्रा जी के पास,
मिश्रा जी ने समझाया,
आज़ादी से पहले,
अंग्रेजों के गुलाम देश जो कमाते थे,
वह धन साझा होकर जमा होता था,
अंग्रेज रानी की तिजोरी में,
और कहलाता था कामनवेल्थ,
इस धन के कुछ हिस्से से,
रानी खेल खिलाती थी,
जिन्हें कहते थे कामनवेल्थ गेम्स,
पर अब तो हम आजाद हैं,
बोले वर्मा जी, शर्मा जी,
क्या बाकई? बोले मिश्रा जी,
तीनों चुप हो गए.

मिश्रा जी ने चुप्पी तोडी,
गुलामी हमारा जन्मसिद्ध अधकार है,
अंग्रेज चले गए तो क्या हुआ?
अपना अधिकार छोड़ देंगे क्या?
देखा नहीं क्या?
कैसे नतमस्तक हो जाते हैं सब,
गोरी चमड़ी के सामने?
कामनवेल्थ गेम्स में जिन्दा है अभी भी गुलामी,
अब रही कामनवेल्थ की बात,
तो अब जनता का साझा धन,
बंटता है मंत्रियों में, बाबुओं में,
ठेकेदारों में, चमचों में,
हजारों करोड़ का वजट है भाई,
कई पीढिया तर जायेंगी.

चलो अब यह बहस बंद करो,
अपना कर्तव्य निभाओ,
आम आदमी धन कमाएगा,
सरकार को कर देगा,
तभी तो जेब भरेगी,
गुलामों के गुलाम नेताओं की.
Get your website at top in all search engines
Contact Rajat Gupta at
9810213037, or
Go to his site

For free advice on management systems - ISO 9001, ISO 14001, OHSAS 18001, ISO 22000, SA 8000 etc.
Contact S. C. Gupta at 9810073862
e-mail to qmsservices@gmail.com
Visit http://qmsservices.blogspot.com