भ्रष्टाचार है - तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, कानून की अवहेलना, योग्यता के मुकाबले निजी पसंद को तरजीह देना, रिश्वत लेना, कामचोरी, अपने कर्तव्य का पालन न करना, सरकार में आज कल यही हो रहा है. बेशर्मी भी शर्मसार हो गई है अब तो.

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Friday, August 28, 2009

चालीस रुपये का सेब

एन ऐपल ए डे कीप्स डाक्टर अवे,
मास्टरजी ने पढाया बच्चों को,
पर खुद गड़बड़ा गए,
एक सेब चालीस रुपये का,
घर में पांच जन,
दो सौ रुपये के सेब हर दिन,
काफी महंगा हो गया है,
कहावतों को जीवन में चरितार्थ करना.

दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ,
एक बच्चा बोला,
गुरूजी पहले खुद खाकर दिखाओ,
सौ रुपये किलो दाल,
क्या खाओगे, क्या गाओगे,
कहावत बदल दो,
सूखी रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ.

सुरक्षा गार्डों से घिरे एक मकान के,
एक अँधेरे कमरे में,
मोमबत्ती जला कर,
घुटनों के बल बैठे थे वह,
हाथ जुड़े थे, आँखें बंद,
कुछ यों बुदबुदा रहे थे,
हे जिन्ना महाराज,
आप बड़े दयालू हैं, कृपालू हैं,
ऐसे ही घमासान चलता रहे,
विरोधी खेमें में,
मेरी कुर्सी सुरक्षित रहे,
फिर पांच साल तक.

Thursday, February 19, 2009

धर्म की तिजारत

कुछ और व्यंग मनमोहन जी के संग्रह से.

उनकी तुर्बत पे एक दिया भी नहीं,
जिनके खूँ से जला चिरागे वतन.
जगमगाते हैं मकबरे उनके,
बेचते रहे जो शहीदों का कफ़न. 

मवालियों को न देखा करो हिकारत से,
न जाने कौन सा गुंडा वजीर बन जाए.

ख़ुद बाग़ के माली ने गुलशन की यह हालत की,
फूलों का लहू बेचा, खुशबू की तिजारत की.

तुम्हें हिंदू की चाहत है न मुस्लिम से अदावत है,
तुम्हारा धर्म सदियों से तिजारत था, तिजारत है.

शायद कोई लीडर नहीं गुजरा है इधर से,
बस्ती में बहुत दिन से अमन देख रहा हूँ. 

Monday, February 9, 2009

कुछ और व्यंग रचनाएं - आज की राजनीति

मनमोहन जी के व्यंग संग्रह से कुछ और रचनाएं प्रस्तुत हैं. संग्रह में रचनाएं कुछ अपनी हैं कुछ दूसरों की. लेखकों का पता नहीं है इस लिए सबको बेनाम धन्यवाद. 

समय समय की बात है, समय समय का योग,
सिक्कों  में  तुलने  लगे  दो  कौड़ी    के     लोग.

बात गोली से कभी पार चली जाती है,
ज्यादा घिसने से सभी धार चली जाती है,
मिले कुर्सी तो औकात न भूलें, लिख लें,
एक ही झटके में सरकार चली जाती है.

जमीन बेच देंगे, गगन बेच देंगे,
यह मुर्दों के सर का कफ़न बेच देंगे,
कलम के सिपाही अगर चुप रहे तो,
वतन के यह नेता वतन बेच देंगे.

ख़ुद लूट लिया काफिला अपना ही जिन्होनें,
ऐसे ही हमें काफिला सालार मिले हैं.

इस दौर के हालत से मजबूर हो गया,
इंसान आज ख़ुद से बहुत दूर हो गया,
राहजन बनाए जाते हैं अब राहबर यहाँ,
क्या खूब अपने मुल्क का दस्तूर हो गया. 

Monday, February 2, 2009

मनमोहन जी का व्यंग संग्रह

वह पेशे से वकील हैं, पर रूचि रखते हैं हास्य-व्यंग में. 
ख़ुद भी व्यंग रचना करते हैं, और यहाँ-वहां से सुनी-पढीं व्यंग रचनाएं संग्रहित भी करते हैं. उनके संग्रह से स्वरचित एक रचना आप सबको समर्पित है.

है कलिकाल तुम्हारी माया,
सचमुच तीन लोक से न्यारी.
मानवता का पाठ पढाते,
कपटी, लोभी, भ्रष्टाचारी.

सच्चे संत महापुरुषों की,
शर्म से गर्दन झुकी हुई है.
पाखंडी गुरुओं को मिल गई,
आज धर्म की ठेकेदारी.

मानवता मिल गई एक दिन,
मैंने देखा बुरा हाल था.
बुरी तरह से बिखरी-बिखरी,
टूटी-टूटी,हारी-हारी. 

Thursday, November 6, 2008

ट्रेफिक जाम

लोगों ने ट्रेफिक जाम लगाया,
लोगों ने ट्रेफिक जाम हटाया,
पुलिस चेक पोस्ट पर बैठी रही,
गाड़ियों को रोकती रही,
जेब गरम करती रही.

Saturday, September 13, 2008

तब बदल जाता है हास्य व्यंग में

हास्य-व्यंग की एक गोष्टी में,
एक सवाल पूछा मैंने,
हास्य क्या है?
और व्यंग क्या है?

हंसाते हैं दोनों कहा किसी ने,
खुलासा किया फ़िर किसी ने,
हास्य हंसाता भर है,
व्यंग भी हंसाता है,
पर देता है,
एक टीस, एक चुभन.

पत्नी का पति पर बेलन फैंकना,
हास्य की संज्ञा पा सकता है,
पर फैका जाता है जब वह बेलन,
एक ऐसे पति पर,
जो लौटा है उड़ा कर,
शराब और जुए में,
बीमार बच्चे की दवा के पैसे,
तब बदल जाता है हास्य व्यंग में.

Monday, September 1, 2008

भगवान् बोले,मैंने भी तो अपना घर बचाना है

कल रात मैंने एक सपना देखा,
सपने में देखा भगवान् को,
मैं तो उन्हें पहचान नहीं पाया,
पहले कभी देखा नहीं था न,
पर वह मुझे पहचान गए,
कहने लगे, 'तुम सुरेश हो न?',
मैंने कहा हाँ, और आप?
उन्होंने बताया मैं भगवान् हूँ,
मैंने कहा आप से मिल कर बहुत खुशी हुई,
'लेकिन मुझे नहीं हुई', वह बोले,
मैं घबरा गया, काँपने लगा,
बोला, 'क्या गलती हो गई भगवन?'
'यह क्या उल्टा-सुलटा लिखते रहते हो ब्लाग्स पर?
जानते नहीं यह नारी प्रगति का ज़माना है,
और कलियुग में प्रगति का मतलब है उल्टा चलना,
वास्तव में यह उल्टा चलना ही सीधा चलना है,
इतनी सी बात नहीं समझ पाते तुम?
अब नारी घर के बाहर रहेगी,
हर वह काम करेगी जो पुरूष करता है,
घर चलाना है तो पुरूष को करना होगा हर वह काम,
जो नारी करती थी अब तक,
वरना न घर होगा न घरवाली',
इतना कह कर वह अद्रश्य होने लगे,
मैं चिल्लाया, 'मेरी बात तो सुनिए',
अद्रश्य होते-होते वह बोले,
'इतना ही समय दिया था मुझे मेरी पत्नी ने,
मैंने भी तो अपना घर बचाना है'.
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