भ्रष्टाचार है - तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, कानून की अवहेलना, योग्यता के मुकाबले निजी पसंद को तरजीह देना, रिश्वत लेना, कामचोरी, अपने कर्तव्य का पालन न करना, सरकार में आज कल यही हो रहा है. बेशर्मी भी शर्मसार हो गई है अब तो.

Friday, April 10, 2009

साइन बोर्ड्स


 
हमें अंग्रेजी आती है 

Saturday, March 7, 2009

हमारी तो आदत है यह !!!

क्या हो गया अगर हमने गांधी जी की व्यक्तिगत बस्तुओं को भारत लाने में मिली सफलता को अपनी पार्टी और सरकार की सफलता कह दिया तो? यह तो हमारी आदत है. हमने हमेशा हर सफलता को अपने खाते में लिखा है, और हर विफलता को दूसरों के खाते में. देश को आज़ादी मिली तो हमने दिलाई. जो मर गए, फांसी पर लटक गए, वेबकूफ थे. यह हमारा पहला महान काम था. इस में तो हमने गाँधी जी को भी किनारे कर दिया. सारा श्रेय हमने अपने परिवार और पार्टी को दे दिया. उसके बाद से हम लगातार ऐसे महान काम करते चले आ रहे हैं. 

आज देश के कितने शिक्षा मंदिर, अस्पताल, सड़कें, इमारतें, सरकारी योजनायें, सब हमारे परिवार के नाम पर चलती हैं. अपनी हर पीढी को भारत रत्न दिया है हमने. कुछ वबकूफ़ लोगों ने पिछले प्रधान मंत्री को भारत रत्न देने का चक्कर चलाया. हमने उन्हें उनकी जगह दिखा दी. हमारी पार्टी को हराकर प्रधानमंत्री बनने वाला व्यक्ति भारत रत्न कैसे हो सकता है? इतनी सी सीधी बात भी इन वेबकूफों की समझ में नहीं आई. हमारी पार्टी की मालिकिन की तस्वीर हर सरकारी विज्ञापन में छपती है. इस पर भी कुछ वेबकूफ ऐतराज करते हैं. करते रहें और जलते रहें. हमें क्या फर्क पड़ता है. 

'जय हो' को आस्कर मिला तो उस का श्रेय हमें जाता है. इससे पहले ओलम्पिक में पहला स्वर्ण पदक भी हमारी वजह से मिला. और भी बहुत से महान कार्य हमने किये हैं पर इस समय याद नहीं आ रहे. यह तो वेबकूफी हैं उन लोगों की जो इसे अपनी व्यकिगत सफलता मानते हैं. 

आओ और हमारी जय-जयकार करो. तुमने भी अगर कुछ अच्छा किया है तो उस का श्रेय हमें दो. यही तुम्हारा कर्तव्य है. अपना कर्तव्य पूरा करो. नहीं तो हमारी मालकिन को अच्छा नहीं लगेगा. 

Thursday, March 5, 2009

मैं हूँ न !!!

राजमाता के चरणों में शत-शत नमन. 

आप क्यों चिंता करती हैं राजमाता? आपकी लोक सभा के लिए चुनावों का कार्यक्रम आपके चुनाव आयोग ने घोषित कर दिया है. चुनाव होंगे और जरूर होंगे. आप चाहती हैं, चुनाव निष्पक्ष हों, देश के अन्दर और देश के बाहर सारी दुनिया को लगे कि चुनाव निष्पक्ष हुए हैं, इसलिए चुनाव निष्पक्ष होंगे. मेरी निष्पक्ष चुनाव की परिभाषा वही है जो आपकी है - केवल वही चुनाव निष्पक्ष है जिस में राजमाता की पार्टी जीतती है. इसलिए आप कोई चिंता न करें. में हूँ न. 

मेरे खिलाफ शिकायत थी. मेरे बड़े  आयुक्त भाई ने उस पर जांच की और मुझे दोषी पाया. मुझे पद से हटाने की सिफारिश कर दी राष्ट्रपति को. शिकायत भी सही थी, जांच भी सही थी, सिफारिश भी सही थी, पर बड़े भाई यह भूल गए कि सत्य वही होता है जिसे राजमाता सत्य कहें. राष्ट्रपति ने आपके निर्देश को सत्य माना और सबको धता बता दी. अब बड़े भाई के हटते ही मैं बड़ा भाई हो जाऊँगा. उसके बाद आपको कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है - मैं हूँ न. 

यह देश आपका है, इस देश की राष्ट्रपति आपकी हैं, इस देश के उपराष्ट्रपति आपके हैं. इस देश के प्रधान मंत्री आपके हैं. सारे  मंत्री आपके हैं. अब इस देश के चुनाव आयोग का मुखिया भी आपका है. यह सब लोग रात-दिन यही कहते रहते हैं - हम हैं न. चुनाव के मामले में भी आप कोई चिंता न करें - मैं हूँ न. 
 
मैं तो यह कहूँगा कि चुनाव की आवश्यकता ही क्या है. लोग नामांकन पत्र भरेंगे. जांच के बाद बस 'हाथ' वाले उम्मीदवार का पर्चा सही पाया जायेगा. बाकी सारे पर्चे किसी न किसी कारण से अस्वीकार कर दिए जायेंगे. सारे 'हाथ' वालों को निर्विरोध निर्वाचित कर दिया जायेगा. जिनको विरोध करना है करेंगे. सारा संसार देखेगा कि भारत में सबको विरोध करने का अधिकार है. सब यही कहेंगे कि सच्चा प्रजातंत्र है भारत. मुझे चुनाव आयोग का मुखिया बनाने में आपने भारतीय जनता और अदालत को जैसे धता बताई वैसे ही मैं भी धता बता दूंगा. आप चिंता न करें - मैं हूँ न. 

आप नाराज न हों. मैंने तो बस एक राय दी थी. ठीक है मैं समझ गया. मुझे अपनी औकात में रहना है.  आप चाहती हैं कि सब कुछ सही तरह से हो. मुझे जो गलत करना है वह भी सही तरह से हो. जहाँ सही करने से 'हाथ' को फायदा हो वहां सही करना है. यहाँ गलत करने से फायदा हो वहां गलत करना है. मतलब यह कि हर हाल में 'हाथ' को ही फायदा होना चाहिए. आप चिंता न करें ऐसा ही होगा - मैं हूँ न. 

इस पत्र को पढ़ कर जला दीजियेगा. 

आपका

मैं हूँ न. 

Monday, March 2, 2009

भारत की सबसे अच्छी नौकरी की जगह खाली है !!!

इस देश में अगर सबसे आसान काम कोई है तो वह है लोक सभा, विधान सभा, नगर निगम की सदस्यता की नौकरी. एक बार इन संस्थाओं में नौकरी पा जाइए और पांच वर्षों तक ऐयाशी कीजिए. बस यह स्थाई नौकरी नहीं है. आपको हर पांच वर्ष बाद नए सिरे से एप्लाई करना पड़ता है. पर खासबात यह है कि आपको जीवन भर पेंशन मिलती है. बस एक दिन हाजिरी लगा दीजिये और जीवन भर पेंशन का मजा लीजिये.

ऐसी नौकरी आपको कहीं नहीं मिलेगी. कोई काम नहीं, बस आराम ही आराम. दफ्तर साल में कुछ ही दिन खुलता है. इन दिनों में भी जब तब दफ्तर कुछ समय के लिए बंद हो जाता है (इसे इन दफ्तरों की भाषा में सत्र स्थगित होना कहते हैं). मान लीजिये आज आपका मूड नहीं है दफ्तर में बैठने का, तो कोई भी बात लेकर चिल्लाना शुरू कर दीजिये. इन दफ्तरों में एक कुआँ होता है, उसमें खड़े हो जाइए और चिल्लाते रहिये. मास्टरजी चुप कराने की कोशिश करेंगे. चुप मत होइए. और ज्यादा चिल्लाइये. मास्टरजी दुखी होकर छुट्टी कर देंगे.

किसी और दफ्तर में अगर आप कोई अपराध कर देंगे, जैसे रिश्वत लेना, मार-पीट करना, तब आपको सजा मिलेगी, पर इन दफ्तरों में आपको इन अपराधों की कोई सजा नहीं मिलती. इस नौकरी के लगते ही आप मान्यवर हो जाते हैं. नौकरी से पहले आपकी फोटो लोकल थाने में लगी है. मोहल्ले में कोई भी अपराध हो, पुलिस आपको थाने ले जाती है और धुलाई करती है. इन दफ्तरों में किसी तरह नौकरी हथिया लीजिये, वही पुलिस आपको सलाम करेगी और सुरक्षा प्रदान करेगी. आखिर आप दस-नम्बरी से मान्यवर हो गए हैं यह नौकरी लगते ही.

यह संस्थायें सही अर्थों में सेकुलर हैं. किसी भी धर्म का व्यक्ति हो इन संस्थाओं में नौकरी पा सकता है. यह संस्थायें सब को एक निगाह से देखती हैं. ऐसा या तो भगवान करते हैं या यह संस्थायें. आप पढ़े-लिखे हैं, आप अंगूठा-टेक हैं, कोई अंतर नहीं. आप ईमानदार हैं, आप परले दर्जे के बेईमान हैं, कोई अंतर नहीं. आपने जीवन में एक चींटी भी नहीं मारी, आपने कितने ही इंसानों को टपका दिया है, कोई अंतर नहीं. मतलब यह कि कोई भी हो, देव या दानव, सबको यहाँ नौकरी मिल सकती है.

आज कल भारत देश के सब से बड़े ऐसे दफ्तर में जगह खाली हो रहीं हैं. जल्दी ही विज्ञापन आने वाला है. ५०० से अधिक नौकरियां हैं. कोई जुगाड़ लगाइए और इस दफ्तर में एक नौकरी हथिया लीजिये. आपकी सात पुश्तें तर जायेंगी. तनख्वाह भी अच्छी है. फ्री मकान मिलता है. फ़ोन, विजली, पानी सब फ्री है. सारे भारत में घूमने का फ्री टिकट मिलता है, रेल और हवाई जहाज का. दफ्तर अटेंड करने का भत्ता भी मिलता है. और भी सारे भत्ते हैं. जब आपको नौकरी मिल जायेगी तो सब पता लग जायेगा. मतलब आपके दोनों हाथों में लड्डू (नहीं नहीं, नोटों की गड्डियां) होंगी. कुछ और गोटी फिट हो गई तो नोट ले जाने के लिए सूटकेस की जरूरत भी पड़ सकती है. नौकरी लगते ही कुछ बड़े सूटकेस खरीद लीजियेगा.

तो क्या ख्याल है, एप्लाई कर रहे हैं न? अगर हाँ, तो हमारी हार्दिक शुभकामनाएं.

Thursday, February 26, 2009

कुछ सवाल और जवाब

१. घडी बनाने की कंपनी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
 - यह तो समय ही बतायेगा.

२. केले की कंपनी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
-  काम करते हुए अक्सर फिसल जाता हूँ.

३. नए हाइवे पर तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
- इतना व्यस्त हूँ कि यह पता ही नहीं चलता कि किधर मुड़ना है. 

४. ट्रेवल एजेंसी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
- मैं कहीं नहीं जा रहा.

५. घूमने वाली कुर्सियों की कंपनी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
- अक्सर मेरा सर घूम जाता है.

६. नींबू जूस की कंपनी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
- इस से ज्यादा कड़वी नौकरियां कर चुका हूँ. 
 
७. गुब्बारे बनाने की कंपनी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
- हम इन्फ्लेशन का मुकाबला नहीं कर पा रहे.

८. क्रिस्टल बाल बनाने की कंपनी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
- मैं अपना फार्चून बना रहा हूँ. 

९. इतिहास की पुस्तक छापने की कंपनी में तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?
- इस का भविष्य सुखद नहीं है. 
 

Monday, February 23, 2009

दरोगा जी के घर चोरी

एक दिन एक अनहोनी हो गई,
दिन दहाड़े एक दरोगाजी के घर चोरी हो गई,
फ़िर भी लोग चोर को शिष्ट बता रहे थे,
उसी के गुण गा रहे थे,
क्योंकि वह जाते-जाते एक अटेची छोड़ गया था,
और एक पत्र भी दरोगाजी की वर्दी में खोंस गया था,
निवेदन किया था,
हुजूर क्या बताएं?
इस शहर के लोग इतने गरीब हो गए हैं,
कि उनसे अपना पेट अब नहीं पल रहा है,
इसलिए मजबूर होकर आप ही के यहाँ यह कार्यक्रम रखना पड़ रहा है,
आशा है गुस्ताखी माफ़ करेंगे,
मेरे ख़िलाफ़ कोई रपट नहीं लिखेंगे,
इस गरीब की सेवाएँ याद रखेंगे,
आज भी अपना कर्तव्य निभाये जा रहा हूँ,
इस अटेची में आपका कमीशन छोड़े जा रहा हूँ. 

(मनमोहन जी के संग्रह से)

Thursday, February 19, 2009

धर्म की तिजारत

कुछ और व्यंग मनमोहन जी के संग्रह से.

उनकी तुर्बत पे एक दिया भी नहीं,
जिनके खूँ से जला चिरागे वतन.
जगमगाते हैं मकबरे उनके,
बेचते रहे जो शहीदों का कफ़न. 

मवालियों को न देखा करो हिकारत से,
न जाने कौन सा गुंडा वजीर बन जाए.

ख़ुद बाग़ के माली ने गुलशन की यह हालत की,
फूलों का लहू बेचा, खुशबू की तिजारत की.

तुम्हें हिंदू की चाहत है न मुस्लिम से अदावत है,
तुम्हारा धर्म सदियों से तिजारत था, तिजारत है.

शायद कोई लीडर नहीं गुजरा है इधर से,
बस्ती में बहुत दिन से अमन देख रहा हूँ. 

Monday, February 9, 2009

कुछ और व्यंग रचनाएं - आज की राजनीति

मनमोहन जी के व्यंग संग्रह से कुछ और रचनाएं प्रस्तुत हैं. संग्रह में रचनाएं कुछ अपनी हैं कुछ दूसरों की. लेखकों का पता नहीं है इस लिए सबको बेनाम धन्यवाद. 

समय समय की बात है, समय समय का योग,
सिक्कों  में  तुलने  लगे  दो  कौड़ी    के     लोग.

बात गोली से कभी पार चली जाती है,
ज्यादा घिसने से सभी धार चली जाती है,
मिले कुर्सी तो औकात न भूलें, लिख लें,
एक ही झटके में सरकार चली जाती है.

जमीन बेच देंगे, गगन बेच देंगे,
यह मुर्दों के सर का कफ़न बेच देंगे,
कलम के सिपाही अगर चुप रहे तो,
वतन के यह नेता वतन बेच देंगे.

ख़ुद लूट लिया काफिला अपना ही जिन्होनें,
ऐसे ही हमें काफिला सालार मिले हैं.

इस दौर के हालत से मजबूर हो गया,
इंसान आज ख़ुद से बहुत दूर हो गया,
राहजन बनाए जाते हैं अब राहबर यहाँ,
क्या खूब अपने मुल्क का दस्तूर हो गया. 

Monday, February 2, 2009

मनमोहन जी का व्यंग संग्रह

वह पेशे से वकील हैं, पर रूचि रखते हैं हास्य-व्यंग में. 
ख़ुद भी व्यंग रचना करते हैं, और यहाँ-वहां से सुनी-पढीं व्यंग रचनाएं संग्रहित भी करते हैं. उनके संग्रह से स्वरचित एक रचना आप सबको समर्पित है.

है कलिकाल तुम्हारी माया,
सचमुच तीन लोक से न्यारी.
मानवता का पाठ पढाते,
कपटी, लोभी, भ्रष्टाचारी.

सच्चे संत महापुरुषों की,
शर्म से गर्दन झुकी हुई है.
पाखंडी गुरुओं को मिल गई,
आज धर्म की ठेकेदारी.

मानवता मिल गई एक दिन,
मैंने देखा बुरा हाल था.
बुरी तरह से बिखरी-बिखरी,
टूटी-टूटी,हारी-हारी. 

Wednesday, January 28, 2009

कुछ चुटकुले

नया साल शुरू हुआ है. इस साल की पहली चुटकुला पोस्ट हाजिर है. 

फ्रिज बिकाऊ है
हमारे एक मित्र कानून का बहुत सम्मान करते हैं. उन्होंने एक नया फ्रिज ख़रीदा. अब समस्या थी कि पुराने फ्रिज का क्या करें. उन्होंने एक एजेंसी से बात की कि पुराने फ्रिज को बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए डिस्पोज करने में कितने रुपए  लगेंगे. एजेंसी ने एक मोटा खर्चा बता दिया. मित्र ने कुछ सोच कर फ्रिज घर के बाहर बगीचे में रख दिया और उस पर एक बोर्ड लगा दिया - आप चाहें तो इसे मुफ्त अपने घर ले जा सकते हैं. हफ्ता गुजर गया पर किसी ने फ्रिज को हाथ भी नहीं लगाया. मित्र ने फ़िर सोचा और बोर्ड बदल दिया. अब उस पर लिखा था - फ्रिज बिकाऊ है, मात्र ५०० रुपए. दूसरे दिन फ्रिज चोरी हो गया. 

फ़िर धो दो
मित्र की पत्नी ने घर बजट में बचत करने के लिए अपनी एक ड्रेस को ड्राई-क्लीन न करवा कर घर में ही धो लिया. पति को प्रभावित  करने के लिए उन्होंने यह बात उन्हें बताई और कहा देखो मैंने ५० रुपए बचा लिए. पति अखबार पढने में व्यस्त थे. उन्होंने कहा, 'एक बार फ़िर धो लो, ५० रुपए और बच जायेंगे'. 

पिज्जा 
मित्र घर वापस जाते हुए बाज़ार होते हुए निकले. एक पिज्जा की दूकान पर पहुंचे और एक पिज्जा पैक करने का ऑर्डर दिया. दूकानदार ने पूछा कि पिज्जा के चार टुकड़े करें या छै. मित्र ने काफ़ी देर सोचा और बोले, 'चार टुकड़े करना, क्योंकि मुझे इतनी भूख नहीं लगी है कि छै टुकड़े खा सकूं'. 

अब कौन घोषणा करेगा?
पहले तेल मंत्री ने, फ़िर ग्रह मंत्री ने, फ़िर कांग्रेस माता ने घोषणा की कि पेट्रोल और डीजल की कीमत कम हो सकती है. मित्र जो काफ़ी समय से कीमत कम होने की प्रतीक्षा कर रहे थे बहुत झल्लाए, 'अरे अब बस भी करो, कितनी लम्बी लिस्ट है घोषणा करने वालों की? लिस्ट छाप दो, हमें पता लग जायेगा कि अब कौन घोषणा करेगा. साले घोषणा किए जा रहे हैं, कीमतें कम नहीं करते'.

अब किसका नंबर है?
प्रधान मंत्री अस्पताल चले गए आपरेशन करवाने. अब स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं. 
घोषणा हुई कि विदेश मंत्री प्रधान मंत्री का काम देखंगे.वह श्रीलंका चले गए उनकी समस्या सुलझाने. 
घोषणा हुई कि रक्षा मंत्री प्रधान मंत्री का काम देखंगे. 
मित्र बहुत झल्लाए, 'यह पाकिस्तान चले जायेंगे उनकी समस्या सुलझाने. इनके बाद किसका नंबर है?'
फ़िर ख़ुद ही सुझाव दिया, 'सब को बाहर भेज दो और राहुल को प्रधान मंत्री बना दो. रिहर्सल हो जायेगा लोक सभा चुनाव के बाद प्रधान मंत्री बनने का'. 

आतंकियों को गोली मार दी
विश्वस्त सूत्रों से ख़बर मिली है कि कुछ आतंकियों को पाकिस्तान में गोली मार दी गई है. यह घटना यह बात पता चलने पर हुई कि गणतंत्र दिवस परेड में अभूतपूर्व सुरक्षा के वाबजूद किसी ने एक जापानी राजनयिक का बैग चुरा लिया. उनका अपराध यह माना गया कि जब एक टुच्चा चोर अन्दर घुस कर बैग चुरा सकता है तो तुम साले यहाँ पाकिस्तान में क्या भाड़ झोंक रहे थे. मुंबई में तम्हारे कुछ साथी क्या मर गए कि तुम सबकी हवा निकल गई. 'गणतंत्र दिवस परेड में अभूतपूर्व सुरक्षा है' का बहाना बना कर साले हिन्दुस्तान से भाग कर घर आ गए. लो अब वहां नहीं मरे तो यहाँ मरो. 

चोर मीडिया
राहुल के कुछ कागज़ चोरी करने का इल्जाम टीवी वालों पर लगाया गया है. क्या था उन कागजों में? 

Sunday, January 25, 2009

पार्क में योग - बेचारे योगी

स्वामी रामदेव ने योग को आम आदमी का योग बना दिया है. अब आपको किसी योग संस्थान में जाने की जरूरत नहीं है. स्वामी जी के एक सप्ताह के योग शिविर  में भाग लीजिये और योग प्रारंभ कर दीजिये. यह भी न कर पायें तो टीवी पर उनका कार्यक्रम देखिये और योग शुरू कर दीजिये. आज कल किसी पार्क में जाइए, आपको लोग प्राणायाम करते नजर आ जायेंगे. कोई अकेले, कोई दुकेले. कहीं स्वामी जी से योग शिक्षण लिए हुए कोई सज्जन योग की क्लास चला रहे हैं. 

में जिस पार्क में जाता हूँ वहां भी इसी तरह की एक योग क्लास चलती है. पुरूष और महिलायें दोनों ही उस में भाग लेते हैं. पर बेचारे यह योगी पार्क के मालियों द्वारा बहुत तंग किए जाते हैं. यह पार्क डीडीऐ का एक डिस्ट्रिक्ट पार्क है, पर बहुत ही दयनीय स्थिति में है. दिन में माली पार्क में पानी चला देते हैं. शायद वह ऐसा पार्क में घास उगाने के लिए करते हैं, पर यह सिर्फ़ समय और पानी की बर्बादी है. पार्क में सूअर और कुत्ते बिना रोक टोक के घूमते हैं. कभी-कभी तो लगता है कि डीडीऐ ने यह पार्क इंसानों के लिए नहीं, सूअर और कुत्तों के लिए बनाया है. इन्होनें पार्क की अधिकतर जमीन को खोद डाला है. हरी घास ख़त्म हो गई है और जमीन नंगी हो गई है. अब वहां घास उगने की कोई सम्भावना नहीं है. फ़िर भी न जाने क्यों माली रोज पानी चला देते हैं. शायद ऐसा करके वह समझते हैं कि उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है. 

इंसानों की तरह पार्कों में भी वीआइपी पार्क होते हैं. इस पार्क की गिनती तो लगता है आम पार्कों में भी नहीं होती, वरना सूअर और कुत्तों का पार्क में क्या काम. दिल्ली में ऐसे कितने डीडीऐ  के पार्क हैं जिन पर किसी भी शहर को गर्व हो सकता है, पर एक पार्क यह भी है जो शहर के नाम पर कलंक है. लोग यहाँ कूड़ा फेंकते हैं. पालतू कुत्तों को टहलाने लाते हैं, हालांकि  इस पर पार्क के कुत्ते और सूअर ऐतराज करते हैं. जुआरी और शराबियों के लिए यह पार्क स्वर्ग है. घूमने के रास्ते कच्चे हैं, उबड़-खाबड़, जगह-जगह पत्थर बाहर निकले हुए, क्यारिओं से पानी इन रास्तों पर आ जाता है और कीचड़ हो जाती है. लोग फिसल जाते हैं. बरसात में तो इन रास्तों पर घूमना खतरा मोल लेना है. एक साल पहले पश्चिम पुरी के २५० निवासियों ने हस्ताक्षर करके एक ज्ञापन इस छेत्र के प्रतिनिधियों को दिया था - एमपी, विधायक, निगम पार्षद. पर कुछ नहीं हुआ. 

पार्क में रौशनी के नाम पर एक बल्ब भी नहीं जलता. आस-पास के लोग बल्ब, होल्डर, स्विच आदि को अपना मान कर अपने घर ले गए हैं. सुबह जब यह योगी पार्क में आते हैं तो अँधेरा होता है. बेचारे सब तरफ़ घूम कर कोई सूखी जगह तलाश करते हैं. मैं उन्हें रोज किसी नई जगह पर योग करते देखता हूँ. आज भी ऐसा ही हुआ. एक अन्तर जरूर था. आज केवल महिलायें ही आई थीं. न जाने किस कारण से पुरूष आज अनुपस्थित थे. क्योंकि आज केवल महिलायें ही थीं इसलिए योग कम और बात-चीत ज्यादा हुई. 

एक महिला पार्क की दुर्दशा पर बहुत खफा थीं. उन्होंने इस छेत्र के विधायक का नाम लेकर कहा कि उसे पकड़ कर लाओ और इस पार्क की दुर्दशा दिखाओ और उस से पूछो कि क्या इस लिए हमने उसे जिताया है. मुझे उनकी यह बात सुन कर बहुत हँसी आई. इस नेतातान्त्रिक देश में क्या कोई किसी नेता को पकड़ सकता है या उसे पकड़ कर कहीं ले जा सकता है? यह महिला सबके साथ रोज मां शारदा से प्रार्थना करती हैं - 
हे शारदे मां, हे शारदे मां,
अज्ञानता से हमें तार दे मां.
और फ़िर ऐसी अज्ञानता की बात करती हैं.
मां शारदा भी इनकी इस अज्ञानता पर मुस्कुरा रही होंगी. इन्हें इतना भी नहीं मालूम कि:
बड़े लड़ैया हैं यह नेता, इनकी मार सही न जाए,
एक को मारें दो मर जाएँ, तीसरा मरे सनाका खाए. 
नेता जी इस बार फ़िर जीत गए. गया पार्क खड्डे में पाँच साल के लिए. हो सकता है तब तक पार्क ही न रहे, पार्किंग लाट बन जाए, कोई माल बन जाए, नए वोट बेंक की झुग्गी-झोंपडी बन जाएँ. 

योग तो करते हैं लोग इस पार्क में, घूमते भी हैं, पर यह भी एक मजबूरी है, जाएँ तो जाएँ कहाँ? 

Wednesday, January 21, 2009

वर्ष २००९ का ऐतिहासिक रविवार !!!

अभी वर्ष २००९ पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ था कि एक ऐतिहासक घटना घट गई. मैं बराक ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने की बात नहीं कर रहा. मैं बात कर रहा हूँ भारत में घटी एक ऐतिहासिक घटना की. हुआ यह कि भारत के मनोनीत प्रधान मंत्री अपने ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण करवाने आरटीओ दफ्तर गए. आज़ादी के बाद आज तक किसी प्रधान मंत्री ने ऐसा महान कार्य नहीं किया. यह भी हो सकता है कि महानता की ऐसी मिसाल पूरे विश्व में भी न हो. कहाँ दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश का प्रधान मंत्री (भले ही मनोनीत हो) और कहाँ एक टुच्चा सा आरटीओ दफ्तर.  कोई सपने में भी यह सोचने की हिमाकत नहीं कर सकता था कि प्रधान मंत्री वहां जायेंगे और वह भी एक टुच्चे  से ड्राइविंग लाइसेंस का नवीकरण करवाने. आप किसी दलाल को पैसे दीजिये और घर बैठे ड्राइविंग लाइसेंस का नवीकरण क्या, नया लाइसेंस ही बनवा लीजिये. हैरानी की बात यह है कि क्या उन्हें यह बात मालूम नहीं थी या उनके किसी सलाहकार ने उन्हें यह नहीं बताया कि यह काम तो कुछ ही पैसों में हो जाता, और इसके लिए देश का इतना महत्वपूर्ण समय और सुरक्षा पर लाखों रुपए खर्च करने की जरूरत नहीं थी. 

हमारे एक मित्र यह सुन कर कहने लगे कि मियाँ तुम समझते तो हो नहीं, बस इन महान लोगों के पीछे लेपटाप लेकर पड़े  रहते हो. अरे भई लोक सभा चुनाव का काउंट डाउन शुरू हो चुका है. अब ऐसे कई महानता के रिकार्ड कायम किए जायेंगे. उनकी पार्टी के एक प्रवक्ता ने पहले ही इस महान कार्य को दूसरों के लिए एक उदाहरण बता दिया है. बैसे तुम्हारे अटल जी भी तो यह महान कार्य कर सकते थे, क्यों नहीं किया उन्होंने? बस 'भारत चमक रहा है' चिल्लाते रहे और चुनाव हार गए. 
'अटल जी मेरे नहीं हैं', मैंने बुरा मानते हुए कहा, 'मैं तो कायदे की बात कर रहा हूँ'. 
'बस फ़िर वही पुराना राग, मियां इन राजनीतिबाजों का कायदे से क्या लेना-देना?' मित्र ने चुटकी ली, 'कायदे की बात करें तो अखबार में लिखा था कि लाइसेंस की मियाद एक महीने पहले ही ख़त्म हो चुकी थी'.
मैंने कहा, 'पर मेरे अखबार में तो लिखा था कि लाइसेंस की मियाद कुछ दिन और बाकी थी'. 
'और क्या लिखा था तुम्हारे अखबार में', मित्र ने पूछा.
'लो तुम ख़ुद ही पढ़ लो', हमने उस महान ख़बर वाला महान अखबार उन की तरफ़ बढ़ा दिया. 

अखबार के अनुसार प्रधान मंत्री ने लाइसेंस का नवीनीकरण रविवार को करवाया था. उस दिन दफ्तर विशेष रूप से खोला गया था. सम्बंधित अधिकारिओं और कर्मचारियों को छुट्टी के दिन विशेष रूप से दफ्तर बुलाया गया था. यह पढ़ कर हमारे मित्र झल्ला गए, 'इस में महानता की क्या बात है?, किसी आम आदमी के काम के लिए तो छुट्टी के दिन दफ्तर नहीं खोला जाता'. 
हमें हँसी आ गई, 'यार अब तो तुम बुरा मान रहे हो. प्रधान मंत्री की यह महानता देख कर अधिकारिओं और कर्मचारियों को भी महानता का अनुभव हो रहा था. उन्होंने छुट्टी के दिन दफ्तर बुलाने का बिल्कुल बुरा नहीं माना. प्रधान मंत्री आम आदमियों की तरह हर काम के लिए लाइन में लगे'.
'और लाइन में वह अकेले थे. यह नहीं कहोगे', मित्र ने फ़िर चुटकी ली.
'नहीं, उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं. उन्होंने सोचा कि लगे हाथ अपना ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवा लूँ'. हमने बताया. 
'बिना लर्निंग लाइसेंस के?' मित्र बोले. 
'पता नहीं यार, छोड़ो इन बातों को, महानता की मिसाल तो कायम हो गई. मेरा सुझाव है कि हर वर्ष जनवरी के तीसरे रविवार को 'राष्ट्रीय महानता दिवस' के रूप में मनाया जाय. सब लोग कम से कम एक महान काम करें. सोचो जरा कैसा लगेगा? हर तरफ़ हर आदमी महान काम कर के महान बना घूम रहा है. राजनीतिबाज, पुलिस वाले, सरकारी बाबू, वकील, डाक्टर हर कोई महान काम कर रहा है. एक दिन के लिए ही सही, सारा भारत देश महान हो गया है'. हमने कहा.
मित्र ने सहमति जतायी और बोले, 'यार एक बात और भी है. जिस ड्राइविंग लाइसेंस के कारण प्रधान मंत्री को यह महानता दिखाने का मौका मिला वह भी तो एक महान ऐतिहासिक दस्तावेज हो गया है. मेरे विचार में उसके लिए राष्ट्रीय अभिलेखागार में स्थान सुरक्षित कर दिया जाना चाहिए, जहाँ बाद में उसे रख दिया जाय और जिसे देख कर लोग महान काम करने के लिए प्रेरणा ले सकें'. 

अब हमें लग रहा है कि इस महानता के बारे में बात करके और ऐसे महान सुझाव दे कर हम भी महान हो गए हैं. 
बोलो महान रविवार की जय. 
नहीं, नहीं, बोलो जनवरी के तीसरे महान रविवार की जय.
महान ड्राइविंग लाइसेंस की जय.
महान ड्राइविंग लाइसेंस के महान नवीकरण की जय.
हमारे और हमारे मित्र के महान सुझावों की जय.
इस महान व्यंग को पढने वाले आप सब महान पाठकों की जय. 
महान टिप्पणीकारों की जय.  

Monday, January 19, 2009

क्यों भई क्यों, आख़िर क्यों?

नजर आती है उनकी तस्वीर,
हर सरकारी विज्ञापन में,
आख़िर कौन हैं वह?
क्या पोजीशन है उनकी?
भारत सरकार में?

सरकार के हर फैसले में,
क्यों नजर आती है?
उनकी दखलंदाजी,
क्यों झुकी रहती है हर समय?
सरकार उनके क़दमों में,

एक देश की गुलामी से मुक्त होकर,
हो गए गुलाम भारतवासी,
एक परिवार के,
एक परिवार के मुखिया के,
कैसी आज़ादी है यह?

क्यों भई क्यों, आख़िर क्यों? 

Friday, January 16, 2009

काम सरकार का, क्रेडिट राजमाता को

सरकार ने मीडिया पर लगाम कसने की बात की तो हल्ला मच गया. मुंबई हमलों में यह तो सबने देखा है कि जैसे गोली-पर-गोली रिपोर्टिंग की जा रही थी उस से आतंकियों को फायदा तो जरूर हुआ. अन्दर बैठकर उन्हें पता चल रहा था कि बाहर क्या हो रहा है. पर मीडिया की भी अपनी मजबूरी है. कम्पटीशन इतना ज्यादा है कि एंकरों को बार-बार यह कहना पड़ता था कि यह जो आप देख रहे हैं बस हमारा चेनल ही आपको दिखा रहा है. अब हर बात का क्रेडिट लेने पर राजनीतिबाजों का तो एकाधिकार नहीं हो सकता. मीडिया को भी यह अधिकार मिलना चाहिए. 

मीडिया वाले प्रधान मंत्री से मिले और उन्होंने पूर्ण आश्वासन दे दिया कि बहुत सोच-समझ और विचार-विमर्श के बाद ही कानून में कोई बदलाव किया जायेगा. प्रधान मंत्री सरकार के प्रमुख हैं. उनके आश्वासन से मीडिया आश्वस्त हो गया. इस बात का क्रेडिट प्रधान मंत्री को मिल गया. लेकिन कांग्रेस की मालकिन और राजमाता को तो कोई क्रेडिट नहीं मिला. यह बात ग़लत हो गई. मीडिया वालों को तुंरत राजमाता के दरबार में हाज़िर होने की हिदायत दी गई. वह हाज़िर हुए और राजमाता ने आदेश दिया कि सरकार कानून में ऐसा कोई बदलाव नहीं करेगी. अब आप यह पूछ सकते हैं कि राजमाता कोई सरकारमाता तो हैं नहीं, उन्होंने कैसे यह कह दिया कि सरकार यह नहीं करेगी? पूछिए,जरूर पूछिए. अब मेरा भी जवाब सुन लीजिये. आप भारत में रहते हैं या कहीं और? 

जब कांग्रेस और करात में ऊपरी दोस्ती थी तो प्रधान मंत्री अक्सर कुछ ऐसा कह देते थे कि करात नाराज हो आते थे. फ़िर राजमाता की और से उनके प्रिय चाटुकार  प्रणब करात के पास जाते थे और मनमोहन जी को माफ़ करवाते थे, करात का गुस्सा ठंडा करवाते थे. सारा क्रेडिट राजमाता को मिलता था. अब देखिये, इंग्लेंड से आए विदेश सचिव ने मुंबई मामले पर भारत सरकार की हर बात को दुत्कार दिया, 'मैं नहीं मानता कि पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियां इन हमलों में शामिल थीं. मैं यह भी नहीं मानता कि इन हमलों के लिए जिम्मेदार आतंकियों को भारत के हवाले किया जाय. इन पर पाकिस्तान में ही मुकदमा चलेगा.' सरकार की फुस-फुस हो गई. सरकारी प्रवक्ता ने इसे सचिव महोदय की व्यक्तिगत राय कह कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली. अब राजमाता ने सचिव महोदय को राहुल बाबा के साथ अमेठी घूमने भेज दिया है. वहां बाबा उन्हें क्या दिखा रहे हैं यह तो आपको बाबा या सचिव से पूचना पड़ेगा? इस बारे में हम कोई अनुमान भी नहीं लगा सकते. एक आम आदमी, राजा लोग जब ऐसे घूमने जाते हैं तो क्या करते हैं उसका अनुमान कैसे लगा सकता है? हाँ  अगर किसी वजह से सचिव महोदय ने अपनी व्यक्तिगत राय बदल दी तो इस का क्रेडिट राजमाता को मिल जायेगा. ऐसे बन जायेगी बात. 

Monday, January 12, 2009

नए साल पर नया धंधा

हमने एक मन्दिर बनाया,
भगवान को उस में बिठाया,
एक बड़ा संदूक ला कर,
उस पर दान पात्र लिखवा कर,
मोटा एक ताला लगा कर,
नए साल पर धूम-धाम से,
खोली एक नई दूकान,
धंधा चले खूब भगवान.

हम दहेज़ के ख़िलाफ़ हैं,
हमें कुछ नहीं चाहिए,
आपकी बेटी है,
आप चाहेंगे सुख से रहे,
उसे जो देंगे और देते रहेंगे,
आपके और उसके बीच की बात है. 

पडोसन बोली,
कब कर रही हो बेटे की शादी?
बेटे को पढाया, लिखाया,
हर तरह से काबिल बनाया,
अब वह अपने पैरों पर खड़ा है,
न जाने क्यों इस बात पर अडा है,
मास्टर जी का बेटा पसंद है उसे,
कहता है उसी से करूंगा शादी.


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