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Monday, October 19, 2009

कामनवेल्थ (साझा धन) खेल स्पर्धा शुरू

साझा धन खेल स्पर्धा,
हो गई समय से पहले शुरू,
कल्मादी, हूपर, फेनेल,
जुट गए मल्ल युद्ध में,
दुसरे को नीचा दिखाने की,
खुद को ऊंचा साबित करने की,
अघोषित प्रतियोगिता का स्वर्ण पदक,
कौन जीतेगा?
कोई भी जीते,
क्या फर्क पड़ता है,
खेल तो हार गए.

Friday, October 9, 2009

निद्रा देवी की कृपा से कामनवेल्थ गेम्स बच गए

आज पार्क में शर्मा जी बहुत खुश थे. लोगों के पूछने पर अपने हाथ में लिया अखवार हिलाते थे और कहते थे, 'आने दो वर्मा को, आज माफ़ी न मंगवाई तो मेरा नाम नहीं'.
किसी की कुछ समझ में नहीं आया तो मिश्रा जी बोले, 'भई आ जाने दो वर्मा जी को सब पता चल जायगा'.
कुछ देर में वर्मा जी आ गए. शर्मा जी ने अखवार उनकी तरफ बढाया और बोले' 'लो पढो इसे और कुछ शर्म बाकी है तो माफ़ी मांगो'. वर्मा जी ने खबर पढ़ी और बोले, 'क्या है यह और किस बात की माफ़ी?'
'अच्छा किस बात की माफ़ी? अरे शर्म करो, भूल गए जब में किसी लेक्चर या प्रेजेंटेशन में सोता हूँ तो मेरा मजाक उडाते हो, बॉस से चुगली लगाते हो और मुझे डांट खिलवाते हो. अब कामनवेल्थ गेम्स फेडरेशन का प्रेसिडेंट प्रेजेंटेशन में सो रहा है तो पूछ रहे हो क्या है यह और किस बात की माफ़ी?'
वर्मा जी से अखवार ले कर हम सबने खबर पढ़ी तो सारी बात समझ में आई.
मिश्रा जी बोले, 'भई वर्मा जी यह बात तो गलत है, शर्मा जी का मजाक उड़ाना, उनकी चुगली करना और बॉस से डांट खिलवाना. अरे भई लेक्चर और प्रेजेंटेशन में सोने वाले तो महान लोग होते हैं. क्या तुमने लोक सभा और विधान सभा में
मंत्रिओं को सोते नहीं देखा? शर्मा जी महान हैं तभी तो सोते हैं,'
सब ने मिश्रा जी की बात का समर्थन किया. वर्मा जी को शर्मा जी से माफ़ी मांगनी पडी.
महान शर्मा जी का सब ने तालियों से अभिनन्दन किया,
मिश्र जी ने कहा, 'अब यह सोते हुए प्रेसिडेंट खेलों की तैयारियों पर पूरा संतोष प्रकट करेंगे. यह भी खुश, भारत सरकार भी खुश, कामनवेल्थ में से अपने-अपने हिस्से की वेल्थ लेने वाले भी खुश. सोचो जरा, अगर यह सोते नहीं तो गए थे कामनवेल्थ खेल दिल्ली से'.

Sunday, October 4, 2009

अच्छा बापू अब अगले साल याद करेंगे तुम्हें

मेरा एक दोस्त जो सरकारी बाबू है इस बार बापू से बहुत खुश था. बापू ने इस साल शुक्रवार को पैदा होकर बहुत अच्छा किया, तीन छुट्टियां बन गईं और वह मसूरी निकल लिया. और भी बहुत सारे लोग बापू से इस बात पर खुश होते हैं कि वह हर साल २ अक्टूबर को पैदा होते हैं और उनकी जेब गरम कर जाते हैं. सरकार ने जनता का करोडों रुपया पानी की तरह बहा दिया विज्ञापनों में. यह बहता पानी कुछ तो गया नेताओं और बाबुओं की जेब में, कुछ गया अखवार वालों की जेब में, और कुछ गया ...... अरे भाई किसी न किसी जेब में तो गया होगा. कुछ सरकारों ने बापू के नाम पर गरीब जनता के लिए कुछ योजनाओं की घोषणा कर दी. अब बापू के अगले जन्म दिन तक सब मजे करेंगे.

एक नवोदित लेखक ने बापू को चिट्ठी लिख डाली कि बापू एक दिन के लिए आ जाओ और ६० सालों में जो बिगडा है उसे ठीक कर जाओ. साथ ही धमकी भी दे दी कि अगर नहीं आये तो हम खुद ठीक कर लेंगे. एक नए मंत्री ने ट्वीट कर दी कि बापू के जन्म दिन पर सब को काम करना चाहिए. इस पर कुछ राजनीतिबाजों ने आदतन बयानबाजी कर डाली. और भी बहुत से लोगों ने कुछ किया होगा और कुछ ने कुछ नहीं भी किया होगा. मतलब यह कि बापू का जन्म दिन आया और निकल गया. कुछ को पता चला और कुछ को नहीं पता चला. जिन को पता चला उन्होंने क्या उखाड़ लिया और जिन्हें नहीं पता चला वह क्या उखाड़ लेते अगर पता चल जाता. हर साल की तरह जो होता है वह इस साल भी हुआ और अगले साल भी होगा.

आज तक कोई बापू को समझ नहीं पाया. सब ने उन्हें अपने हिसाब से समझा. वह जैसे थे बैसा किसी ने नहीं समझा. बापू हम सबकी तरह एक आम इंसान थे. वह कोई मसीहा नहीं थे. बस कुछ आम इंसान अपने व्यवहार में दूसरे आम इंसानों से ऊपर उठ जाते हैं. बापू एक ऐसे ही आम इंसान थे. पर कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए उन्हें मसीहा का नाम दे दिया, राष्ट्रपिता कह दिया, और इस ब्रांडिंग का पेटेंट अपने नाम कर लिया. आज तक उनकी पीढियां इस ब्रांडिंग का फायदा उठा रही हैं. वास्तविकता तो यह है कि बापू के आदर्शों का सबसे ज्यादा मजाक इन्हीं लोगों ने उड़ाया. यह बापू की सबसे बड़ी कमजोरी थी कि वह सही और गलत आदमी में भेद नहीं कर पाए. सब उन्हें प्यार करते थे, उनका आदर करते थे, और इसी प्यार और आदर का गलत इस्तेमाल करके बापू ने इन गलत लोगों को इस देश और जनता पर थोप दिया.

बापू की सबसे बड़ी खासियत थी उनका मानवीय संबंधों के प्रति आदर. मेरे विचार से यह एक खासियत बापू को एक आम इंसान से बहुत ऊपर उठा ले गई. अफ़सोस की बात यह है कि उनकी इसी खासियत को लोग समझ नहीं पाए. बापू सबसे प्रेम करते थे. उन्होंने कभी किसी से नफरत नहीं की. यही प्रेम उनके अहिंसा के सिद्धांत का आधार था. जो इंसान प्रेम करता है वह हिंसक हो ही नहीं सकता. आज भारतीय समाज में मानवीय संबंधों के प्रति जो अनादर है उसे दूर किये बिना बापू का जन्म दिन मनाने का कोई मतलब नहीं है.

Friday, October 2, 2009

जनता का धन है किसका साझा धन?

वर्मा जी ने पूछा शर्मा जी से,
यह कामनवेल्थ क्या है?
अरे इतना भी नहीं जानते?
कामनवेल्थ यानी साझा धन,
वर्मा जी बुरा मान गए,
इतनी अंग्रेजी हिंदी आती है मुझे,
यह बताओ कहाँ है यह धन?
और किस किस में साझा है?
यार यह तो कभी सोचा नहीं,
हाँ अखवार भरे हैं इस बारे में,
कोई खेल होंगे २०१० में,
जिनका नाम है कामनवेल्थ गेम्स.

दोनों गए मिश्रा जी के पास,
मिश्रा जी ने समझाया,
आज़ादी से पहले,
अंग्रेजों के गुलाम देश जो कमाते थे,
वह धन साझा होकर जमा होता था,
अंग्रेज रानी की तिजोरी में,
और कहलाता था कामनवेल्थ,
इस धन के कुछ हिस्से से,
रानी खेल खिलाती थी,
जिन्हें कहते थे कामनवेल्थ गेम्स,
पर अब तो हम आजाद हैं,
बोले वर्मा जी, शर्मा जी,
क्या बाकई? बोले मिश्रा जी,
तीनों चुप हो गए.

मिश्रा जी ने चुप्पी तोडी,
गुलामी हमारा जन्मसिद्ध अधकार है,
अंग्रेज चले गए तो क्या हुआ?
अपना अधिकार छोड़ देंगे क्या?
देखा नहीं क्या?
कैसे नतमस्तक हो जाते हैं सब,
गोरी चमड़ी के सामने?
कामनवेल्थ गेम्स में जिन्दा है अभी भी गुलामी,
अब रही कामनवेल्थ की बात,
तो अब जनता का साझा धन,
बंटता है मंत्रियों में, बाबुओं में,
ठेकेदारों में, चमचों में,
हजारों करोड़ का वजट है भाई,
कई पीढिया तर जायेंगी.

चलो अब यह बहस बंद करो,
अपना कर्तव्य निभाओ,
आम आदमी धन कमाएगा,
सरकार को कर देगा,
तभी तो जेब भरेगी,
गुलामों के गुलाम नेताओं की.

Monday, September 28, 2009

रावण के चेहरे में दिखता है उन्हें अपना चेहरा

नेता जी बहुत परेशान थे,
शहर की रामलीला ने,
मुख्य अतिथि बनाया था उन्हें,
उन्हें वाण चलाना था,
रावण को जलाना था,
हमने उन्हें वधाई दी,
वह और परेशान हो गए,
हमने पूछा तो अकेले में ले गए,
बोले रावण की तरफ देखो,
हमने रावण की तरफ देखा,
बोले रावण का चेहरा देखो,
हमने रावण का चेहरा देखा,
क्या दिखाई दिया, उन्होंने पूछा,
डराबना, बुराई का मूर्त रूप,
वह और परेशान हो गए,
उदास स्वर में बोले,
रावण के चेहरे में दिखता है मुझे,
मेरा अपना चेहरा,
यह कहते हैं जलाना है उसे,
कैसे जला दूं खुद को?
मैंने फिर से देखा और डर गया,
चुपके से खिसक लिया,
बाद में पता चला,
नेताजी की तबियत ख़राब हो गई,
अस्पताल में भरती हो गए,
बच गए रावण को जलाने से,
आत्मह्त्या करने से.

Saturday, September 26, 2009

सोच रहा हूँ राष्ट्रपति बन जाऊं

कल अखवार पढ़ कर,
फिर मन में आया,
क्यों न राष्ट्रपति बन जाऊं?
एक बार पहले भी आया था मन में,
जब हाईवे टोल पर एक बोर्ड पढ़ा था,
राष्ट्रपति की कार को टोल नहीं देना,
राष्ट्रपति बने और फुर्र से निकल गए,
वर्ना खड़े रहो लाइन में और पैसा भी दो,
अब एक और पर्क मिला राष्ट्रपति को,
बेटे को एम्एलए का टिकट मिलेगा,
चिंता ख़त्म,
बेटा कैसा भी योग्य या अयोग्य हो,
नौकरी पक्की,
और कोई ऐसी बैसी नौकरी नहीं,
मरने तक रिटायरमेंट नहीं,
मजे ही मजे,
न कोई काम न धाम,
काम करो तो फायदा,
न करो तो फायदा,
दोनों हाथों में लड्डू,
क्या ख्याल है भाइयों,
बन जाऊं राष्ट्रपति?

Wednesday, September 23, 2009

'भोंदू', 'पागल', बेबकूफ'

भारतीय पत्नी समाज के लिए यह एक आनद विभोर कर देने वाली खबर है. आप अपने पति को 'भोंदू', 'पागल', बेबकूफ' कह सकती हैं, और कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. अगर आपका पति कम शिक्षित है तब आप उसका जितना चाहे मजाक उड़ा सकती हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने आपको यह अधिकार दिया है. जिन पत्नियों ने अभी तक इस परम आनंद का अनुभव नहीं किया है वह तुंरत इस अधिकार का प्रयोग करना शुरू कर दें.

वधाई हो.

Sunday, September 20, 2009

आओ खर्चा बचाएँ

शर्मा जी बहुत खुश थे,
केटल क्लास में सफ़र करके,
सरकार खर्चा बचा रही है,
वर्मा जी नाराज थे,
सरकार खर्चा नहीं बचा रही,
आम आदमी का मजाक उड़ा रही है,
कितने दिन चलेगा यह नाटक?
खर्चा बचाने का.

वर्मा जी बोले,
अखवार भरे हैं,
सरकारी विज्ञापनों से,
विज्ञापन भरे हैं फोटो से,
राजनीतिबाजों के,
किसका पैसा है यह?
क्यों नहीं होती इस में,
खर्चा बचाने की मुहिम?

हाँ भाई, शर्मा जी बोले,
खुले आम हो रही है चमचागिरी,
हर विज्ञापन में मेडम की फोटो,
मेडम पार्टी में हैं, सरकार में नहीं,
पैसा जनता का है, पार्टी का नहीं,
यह मजाक सिर्फ जनता से नहीं,
कानून के साथ भी है.

Tuesday, September 15, 2009

गर्व की बात है या शर्म की ?


कितनी अजीब बात है कि आज कल अखवार ऐसी प्रतियोगिताएं करवाते हैं जिन में आपने यह वोट देना होता है कि कौन सी लड़की गर्म है और कौन सी नहीं. अखवार के अनुसार यह उस लडकी और उस के कालिज के लिए गर्व की बात होगी. कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं, अगर कोई लड़का किसी लडकी को 'क्या माल है' कह देता था तो झगडा होने की पूरी सम्भावना रहती थी. पर आज कल क्या कहते हैं, ज़माना बदल गया है. औरतें इस बात पर गर्व अनुभव करती हैं कि मर्द उन्हें 'गर्म' की संज्ञा देते हैं. सोशल वेबसाइट्स पर अगर कोई लड़का किसी लडकी की फोटो पर यह कमेन्ट कर दे कि वह 'हॉट' है तो जवाब में वह लड़की 'थैंक्स' कहती है.

आगे क्या होगा, जरा सोचिये? लड़का लडकी के घर आया और उस के पिता से कहा कि आपकी लड़की बहुत 'हॉट' है इस लिए मैं उसे डेट पर ले जाने आया हूँ. लडकी के पिता का सीना चौडा हो गया. लगा जिन्दगी धन्य हो गई. गर्व से मुस्कुराते हुए कहा 'थैंक्स', 'हाँ हाँ ले जाओ'. फिर बेटी की और गर्व से देखा और कहा, 'जाओ बेटी, आज तुमने समाज में मेरा सर गर्व से ऊंचा कर दिया'.

Friday, August 28, 2009

चालीस रुपये का सेब

एन ऐपल ए डे कीप्स डाक्टर अवे,
मास्टरजी ने पढाया बच्चों को,
पर खुद गड़बड़ा गए,
एक सेब चालीस रुपये का,
घर में पांच जन,
दो सौ रुपये के सेब हर दिन,
काफी महंगा हो गया है,
कहावतों को जीवन में चरितार्थ करना.

दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ,
एक बच्चा बोला,
गुरूजी पहले खुद खाकर दिखाओ,
सौ रुपये किलो दाल,
क्या खाओगे, क्या गाओगे,
कहावत बदल दो,
सूखी रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ.

सुरक्षा गार्डों से घिरे एक मकान के,
एक अँधेरे कमरे में,
मोमबत्ती जला कर,
घुटनों के बल बैठे थे वह,
हाथ जुड़े थे, आँखें बंद,
कुछ यों बुदबुदा रहे थे,
हे जिन्ना महाराज,
आप बड़े दयालू हैं, कृपालू हैं,
ऐसे ही घमासान चलता रहे,
विरोधी खेमें में,
मेरी कुर्सी सुरक्षित रहे,
फिर पांच साल तक.

Saturday, August 22, 2009

सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आत्मिक सुख

आज सुबह पार्क में सिन्हा साहब बहुत खुश नजर आ रहे थे. मुहाबरे की भाषा में कहें तो, ख़ुशी फूटी पड़ रही थी उनके चेहरे पर. बैसे ध्यान से देखने पर अत्यधिक प्रसन्न सिन्हा साहब के चेहरे पर कुछ परेशानी भी नजर आ रही थी. अत्यधिक प्रसन्नता और कुछ परेशानी का ऐसा अद्भुत संगम मैंने पहले कभी नहीं देखा था. कई लोगों ने पूछा पर उन्होंने अपनी इस प्रसन्नता और परेशानी को किसी के साथ बांटा नहीं था. जब मेरी उत्सुकता मुझे परेशान करने लगी तो मैं भी उनके पास पहुँच गया.
मुझे देखते ही बोले, 'दीवान साहब नहीं आये अभी तक?'
दीवान साहब उनके लंगोटिया यार हैं. तो यह कारण था उनकी परेशानी का. ख़ुशी की बात दीवान साहब को न बता पाने के कारण परेशान थे सिन्हा साहब. खैर यह परेशानी ज्यादा देर नहीं रही. दीवान साहब भी आ गए.
सिन्हा साहब ने अपनी शिकायत दर्ज कराई, 'कहाँ रह गए थे यार? इतनी देर से इंतज़ार कर रहा हूँ.'
'यार कल रात दारू पार्टी ज्यादा देर तक चली. उठने में देर हो गई', सिन्हा साहब ने सफाई दी और पूछा, 'तुम कहाँ रहे कल? पार्टी में नहीं आये'.
'अरे यही तो बताना है तम्हें' सिन्हा साहब ने कहा और दीवान साहब का बाजू पकड़ कर उन्हें झाडियों की तरफ ले गए.
मैं भी खिसका और झाडियों की दूसरी तरफ छिप कर खड़ा हो गया. सिन्हा साहब ने दीवान साहब को जो बताया वह मैं आपको बता रहा हूँ, पर इस शर्त के साथ कि आप किसी और को नहीं बताएँगे.
दीवान साहब, 'हाँ अब बताओ.'
सिन्हा साहब, 'यार तुम तो जानते ही हो कि ईश्वर ने मुझे हर गलत काम करने का आत्मिक सुख दिया, पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने के आत्मिक सुख से अभी तक बंचित कर रखा था. कल वह सुख भी प्राप्त हो गया'.
दीवान साहब, 'भई वधाई हो, अब जल्दी से खुलासा कर के बताओ'.
सिन्हा साहब, 'तुम्हे पता ही है कि मैं बेटे की शादी कर रहा हूँ और उस के लिए मकान में कुछ फेर बदल करवा रहा हूँ'.
दीवान साहब, 'हाँ हाँ मालूम है, अब आगे कहो'.
सिन्हा साहब, 'दो दिन से पिछले कमरे में काम चल रहा था कि तुम्हारी भाभी ने एक आइडिया दिया. क्यों न सड़क की तरफ दीवार बढा कर एक अलमारी और एक स्टोर बना लें? इस से कमरे में जगह भी खूब मिल जायेगी और सरकारी जमीन पर कब्जा करने का तुम्हारा सपना भी पूरा हो जाएगा. मेरी तो बांछे खिल गई यार, क्या आइडिया दिया था बीबी ने'.
दीवान साहब, 'वाह क्या बात है. किसी ने सही कहा है कि हर सफल आदमी के पीछे एक औरत होती है'.
सिन्हा साहब, 'हाँ यार, भगवान् ऐसी बीबी किसी दुश्मन को न दे. कल रात जा कर यह महान काम पूरा हुआ. तब से एक गहरे आत्मिक आनंद का अनुभव कर रहा हूँ'.
दीवान साहब, 'लेकिन लोग ऐतराज नहीं करेंगे क्या? सड़क बैसे ही काफी तंग है, अब तो और भी तंग हो जायेगी'.
सिन्हा साहब, 'अरे यार यह बात तो मेरे इस आत्मिक आनंद को दुगना कर रही है. आपके कारण पडोसी परेशान हों, इसी में तो मनुष्य जीवन की सफलता है. एक मीठी गुदगुदी सी महसूस कर रहा हूँ अपने अन्दर. आज जब दिन में सब देखेंगे और जलेंगे तो कितना आनंद मिलेगा हमें'.
दीवान साहब, 'अगर किसी ने शिकायत कर दी तो?'.
सिन्हा साहब, 'अरे वह तो शायद कर भी चुके लोग. पुलिस वाले और नगर निगम वाले आये थे और अपनी भेंट ले कर चले गए. अब माता रानी को भेंट और चढानी है. आखिर उनकी कृपा से ही तो यह सब संभव हुआ है'
दीवान साहब, 'वधाई हो, अब मिठाई कब खिला रहे हो?'.
सिन्हा साहब, 'क्या यार तुम भी, मिठाई नहीं दारू और मुर्गे की बात करो. माता रानी की कृपा हुई है, क्या मिठाई से निपटा दूंगा? फाइव स्टार में पार्टी होगी यार'.
दीवान साहब, 'जय माता रानी की. चलो अब चलते हैं, माँ की कृपा के दर्शन तो कर लें'.

Monday, August 17, 2009

वह जमानत पर रहेंगे

उनकी जमानत की अर्जी मंजूर हो गई,
सरकारी वकील की बहस नामंजूर हो गई,
अदालत में फिर एक बार साबित हो गया,
कानून अँधा नहीं है,
वह अपराधी को देखता है,
उसके परिवार के देखता है,
उसके सोशल स्टेटस को देखता है,
और वह कोई चपरासी नहीं थे,
वह तो थे सुपुत्र एक महान नेता के,
दलितों के आयोग के मुखिया के,
और कोई पांच रुपये की रिश्वत का मामला नहीं था यह,
एक करोड़ की रिश्वत का मामला था,
चपरासी होते तो नौकरी जाती,
जेल भी जाते,
अदालत ने चिंता जतायी,
अगर जेल में उनका चरित्र बिगड़ गया तो?
किसी अपराधी ने उन्हें छू लिया तो?
एक करोड़ से पांच रुपये का पतन,
अदालत को बर्दाश्त नहीं हुआ,
और एक महान निर्णय आया,
वह जमानत पर रहेंगे,
अपने घर,
अपने महान पिता की गोद में.

Thursday, August 6, 2009

महान लोगों द्बारा स्थापित महान आदर्श

बूटा जी का आदर्श - अगर इस्तीफा देने को कहा तो जान दे दूंगा.
मीरा जी का आदर्श - भले ही लाखों जीवित हिंदुस्तानिओं के सर पर छत न हो, मुझे मेरे मृत पिता के लिए आलीशान मकान चाहिए.
जजों के आदर्श - हमसे व्यक्तिगत संपत्ति का व्योरा देने के लिए कहना न्याय पालिका का अपमान है. देखते नहीं अदालत में हमारी कुर्सी सबसे ऊंची होती है.
जजों का एक और आदर्श - जनता का सूचना अधिकार हम पर लागू नहीं होता.
माया का आदर्श - जनता भूखी है तो यह उसका प्रारब्ध है. सूखा प्रदेश में मेरी और हाथिओं की मूर्तियाँ हरियाली की वर्षा करेंगी.
ममता का आदर्श - जो मैंने कह दिया वही सच है, शाश्वत है, सनातन है, भले ही गलत कह दिया हो.
कांग्रेस का आदर्श - पार्टी और सरकार कब साथ और कब अलग है यह फैसला मालकिन करेंगी.
बीजेपी का आदर्श - चुनाव हरा कर हमसे आदर्श की उम्मीद करते हो?
हारे हुए नेताओं के आदर्श - एक बार सरकारी मकान में घुस गए तो उस से बाहर न निकलना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है.

Wednesday, August 5, 2009

वर्ल्ड क्लास शहर का वर्ल्ड क्लास पार्क

समझ नहीं पाता हूँ मैं,
शिकायत करुँ या करुँ धन्यवाद?
दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार,
कौन है धन्यवाद का हकदार?
सांसद, एम्एलए, पार्षद,
किसे पहनाऊं प्रशंसा का हार?
उपराज्यपाल, डीडीए उपाध्यक्ष,
किस की प्रशंसा का हूँ मैं कर्जदार?
डीडीए डिस्ट्रिक्ट पार्क पश्चिम पुरी,
गढ़ रहा है नए मानक लगातार,
इंसान करते हैं योग, प्राणायाम,
पास मैं सूअर करते हैं विहार,
गाय चरती हैं कूड़ा पार्क में,
कुतिया करती है बच्चों से दुलार,
युवा चलाते हैं वाइक पार्क में,
बच्चे रहते हैं साइकिल पर सवार,
अम्मा फेंकती हैं कूड़ा पार्क में,
बाबा बीड़ी पी कर करते हैं हवा में सुधार,
भैया टहलाते हैं कुत्ता पार्क में,
भाभी की आँखों से छलकता है प्यार,
बच्चे दौड़ते हैं क्यारियों में,
फूल तोड़ता है परिवार,
क्रिकेट और फुटबाल खेलकर,
घास का करते जीर्णोद्दार
खाली बोतल खोजते बीपीएल बच्चे,
दारू पीकर फेंक गए थे छोटे सरकार,
कल मनाई थी पिकनिक पार्क में,
कूडादान करता रहा इंतज़ार,
वर्ल्ड क्लास शहर है दिल्ली,
बारी जाऊं मैं बारम्बार,
क्लिक करो यदि निम्न लिंक पर,
खुल जायेंगे चित्र हज़ार.

Thursday, July 30, 2009

कचरा संस्कृति

एक महिला परेशान खोई-खोई अपने बरामदे में टहल रही थी. दोपहर का वक़्त था. उनकी पडोसन भी अपने बरामदे में आईं. इन परेशान महिला को देखा तो बोलीं, 'क्या बात है बहन, बड़ी परेशान लग रही हो. सब ठीक तो है न?'
महिला, 'हाँ सब ठीक है, बस कुछ उलझन सी हो रही है'.
पडोसन, कैसी उलझन?'
महिला, 'ऐसा लग रहा है जैसे मैंने कुछ करना था पर किया नहीं और अब याद भी नहीं आ रहा कि क्या करना था.'
पडोसन, 'अरे तो इस में परेशान क्या होना. एक-एक करके गिन लो कि क्या करना था और क्या नहीं किया. सुबह उठने से शुरू करो.
'हाँ यह ठीक है', महिला ने खुश हो कर कहा और मन ही मन गिनना शुरू किया. कुछ ही देर में ख़ुशी से चिल्लाईं, 'याद आ गया. आज मैंने अभी तक पार्क में कचरा नहीं फेंका. बस इसी बात से उलझन हो रही थी.'
पडोसन, 'चलो ठीक हुआ, अब जल्दी से कचरा फेंको पार्क में और इस उलझन से छुटकारा पाओ'.'
महिला ने जोर से आवाज लगाईं, 'अरे बहू जल्दी दे प्लास्टिक में डाल कर कचरा दे, पार्क में फेंकना है.'
'पर सासूजी कचरा तो सारा जमादार ले गया.' बहू अन्दर से चिल्लाई.
'थोडा बचाकर नहीं रख सकती थी मेरे लिए? रोज पार्क में कचरा फेंकती हूँ जानती नहीं क्या?' महिला गुस्से से चिल्लाईं.
बहू बाहर आकर बोली, 'मैंने सोचा आपने फेंक दिया होगा. रोज सुबह आप सबसे पहला काम आप यही तो करती हैं.'
'अरे आज भूल गई', महिला बोली, 'अब जल्दी से कुछ कचरा तैयार करके ले आ. जब तक कचरा पार्क में नहीं फेंकूँगी मेरी उलझन दूर नहीं होगी'.
'अब इतनी जल्दी कचरा कहाँ से पैदा करूँ?, बहू ने कहा.
'हे भगवान्, किस गंवार को हमारे पल्ले बाँध दिया. जरा सा कचरा तक नहीं पैदा कर सकती.' महिला ने परेशानी में अपने माथे पर हाथ मारा.
बहू कुछ नहीं बोली और झल्लाती हुई अन्दर चली गई. मन में सोचा, बाबूजी को क्यों नहीं फेंक देती पार्क में, बेचारों का हर समय कचरा करती रहती है.
इधर महिला और परेशान हो गई. अचानक ही उन्हें एक आईडिया सूझा. उन्होंने अपनी पडोसन से कहा, 'बहन आपके यहाँ थोडा कचरा होगा? मुझे दे दीजिये कल लोटा दूँगी. मेरा आज का काम हो जाएगा.'
'हाँ हाँ बहन ले लीजिये कचरा और लौटाने की कोई जरूरत नहीं. आप अक्सर चाय, चीनी, दूध मांगती रहती हैं. कभी लौटाया है क्या कि अब कचरा लौटाएँगी'. पडोसन मुस्कुराते हुए बोली.
महिला तिलमिलाईं पर हंसते हुए बोली, 'अब जल्दी से मंगवा दो न कचरा.'
पडोसन ने अपनी बहू को आवाज दी, 'अरे बहू थोडा कचरा एक प्लास्टिक में डाल कर ले आ. आंटी को पार्क में फेंकना है.'
बहू कचरा ले कर आई और आंटी को दे दिया. महिला ने कचरे से भरा प्लास्टिक पार्क में फेंक दिया. दूर बैठा एक कुत्ता दौड़ा हुआ आया आया. प्लास्टिक को फाड़ा और कचरे को इधर उधर फैला दिया.
महिला के चेहरे पर प्रसन्नता और शान्ति का भाव था, ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कोई महान सामजिक और सांस्कृतिक कर्तव्य पूरा किया हो. वह हंसते हुए पड़ोसन से बोली, 'बहन आपका बहुत बहुत धन्यवाद. आपका यह उपकार जिंदगी भर नहीं भूलूंगी.'
पड़ोसन बोली, 'पड़ोसी होते किस लिए हैं?'
जय कचरा संस्कृति.

 

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