भ्रष्टाचार है - तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, कानून की अवहेलना, योग्यता के मुकाबले निजी पसंद को तरजीह देना, रिश्वत लेना, कामचोरी, अपने कर्तव्य का पालन न करना, सरकार में आज कल यही हो रहा है. बेशर्मी भी शर्मसार हो गई है अब तो.

Wednesday, January 21, 2009

वर्ष २००९ का ऐतिहासिक रविवार !!!

अभी वर्ष २००९ पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ था कि एक ऐतिहासक घटना घट गई. मैं बराक ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने की बात नहीं कर रहा. मैं बात कर रहा हूँ भारत में घटी एक ऐतिहासिक घटना की. हुआ यह कि भारत के मनोनीत प्रधान मंत्री अपने ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण करवाने आरटीओ दफ्तर गए. आज़ादी के बाद आज तक किसी प्रधान मंत्री ने ऐसा महान कार्य नहीं किया. यह भी हो सकता है कि महानता की ऐसी मिसाल पूरे विश्व में भी न हो. कहाँ दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश का प्रधान मंत्री (भले ही मनोनीत हो) और कहाँ एक टुच्चा सा आरटीओ दफ्तर.  कोई सपने में भी यह सोचने की हिमाकत नहीं कर सकता था कि प्रधान मंत्री वहां जायेंगे और वह भी एक टुच्चे  से ड्राइविंग लाइसेंस का नवीकरण करवाने. आप किसी दलाल को पैसे दीजिये और घर बैठे ड्राइविंग लाइसेंस का नवीकरण क्या, नया लाइसेंस ही बनवा लीजिये. हैरानी की बात यह है कि क्या उन्हें यह बात मालूम नहीं थी या उनके किसी सलाहकार ने उन्हें यह नहीं बताया कि यह काम तो कुछ ही पैसों में हो जाता, और इसके लिए देश का इतना महत्वपूर्ण समय और सुरक्षा पर लाखों रुपए खर्च करने की जरूरत नहीं थी. 

हमारे एक मित्र यह सुन कर कहने लगे कि मियाँ तुम समझते तो हो नहीं, बस इन महान लोगों के पीछे लेपटाप लेकर पड़े  रहते हो. अरे भई लोक सभा चुनाव का काउंट डाउन शुरू हो चुका है. अब ऐसे कई महानता के रिकार्ड कायम किए जायेंगे. उनकी पार्टी के एक प्रवक्ता ने पहले ही इस महान कार्य को दूसरों के लिए एक उदाहरण बता दिया है. बैसे तुम्हारे अटल जी भी तो यह महान कार्य कर सकते थे, क्यों नहीं किया उन्होंने? बस 'भारत चमक रहा है' चिल्लाते रहे और चुनाव हार गए. 
'अटल जी मेरे नहीं हैं', मैंने बुरा मानते हुए कहा, 'मैं तो कायदे की बात कर रहा हूँ'. 
'बस फ़िर वही पुराना राग, मियां इन राजनीतिबाजों का कायदे से क्या लेना-देना?' मित्र ने चुटकी ली, 'कायदे की बात करें तो अखबार में लिखा था कि लाइसेंस की मियाद एक महीने पहले ही ख़त्म हो चुकी थी'.
मैंने कहा, 'पर मेरे अखबार में तो लिखा था कि लाइसेंस की मियाद कुछ दिन और बाकी थी'. 
'और क्या लिखा था तुम्हारे अखबार में', मित्र ने पूछा.
'लो तुम ख़ुद ही पढ़ लो', हमने उस महान ख़बर वाला महान अखबार उन की तरफ़ बढ़ा दिया. 

अखबार के अनुसार प्रधान मंत्री ने लाइसेंस का नवीनीकरण रविवार को करवाया था. उस दिन दफ्तर विशेष रूप से खोला गया था. सम्बंधित अधिकारिओं और कर्मचारियों को छुट्टी के दिन विशेष रूप से दफ्तर बुलाया गया था. यह पढ़ कर हमारे मित्र झल्ला गए, 'इस में महानता की क्या बात है?, किसी आम आदमी के काम के लिए तो छुट्टी के दिन दफ्तर नहीं खोला जाता'. 
हमें हँसी आ गई, 'यार अब तो तुम बुरा मान रहे हो. प्रधान मंत्री की यह महानता देख कर अधिकारिओं और कर्मचारियों को भी महानता का अनुभव हो रहा था. उन्होंने छुट्टी के दिन दफ्तर बुलाने का बिल्कुल बुरा नहीं माना. प्रधान मंत्री आम आदमियों की तरह हर काम के लिए लाइन में लगे'.
'और लाइन में वह अकेले थे. यह नहीं कहोगे', मित्र ने फ़िर चुटकी ली.
'नहीं, उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं. उन्होंने सोचा कि लगे हाथ अपना ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवा लूँ'. हमने बताया. 
'बिना लर्निंग लाइसेंस के?' मित्र बोले. 
'पता नहीं यार, छोड़ो इन बातों को, महानता की मिसाल तो कायम हो गई. मेरा सुझाव है कि हर वर्ष जनवरी के तीसरे रविवार को 'राष्ट्रीय महानता दिवस' के रूप में मनाया जाय. सब लोग कम से कम एक महान काम करें. सोचो जरा कैसा लगेगा? हर तरफ़ हर आदमी महान काम कर के महान बना घूम रहा है. राजनीतिबाज, पुलिस वाले, सरकारी बाबू, वकील, डाक्टर हर कोई महान काम कर रहा है. एक दिन के लिए ही सही, सारा भारत देश महान हो गया है'. हमने कहा.
मित्र ने सहमति जतायी और बोले, 'यार एक बात और भी है. जिस ड्राइविंग लाइसेंस के कारण प्रधान मंत्री को यह महानता दिखाने का मौका मिला वह भी तो एक महान ऐतिहासिक दस्तावेज हो गया है. मेरे विचार में उसके लिए राष्ट्रीय अभिलेखागार में स्थान सुरक्षित कर दिया जाना चाहिए, जहाँ बाद में उसे रख दिया जाय और जिसे देख कर लोग महान काम करने के लिए प्रेरणा ले सकें'. 

अब हमें लग रहा है कि इस महानता के बारे में बात करके और ऐसे महान सुझाव दे कर हम भी महान हो गए हैं. 
बोलो महान रविवार की जय. 
नहीं, नहीं, बोलो जनवरी के तीसरे महान रविवार की जय.
महान ड्राइविंग लाइसेंस की जय.
महान ड्राइविंग लाइसेंस के महान नवीकरण की जय.
हमारे और हमारे मित्र के महान सुझावों की जय.
इस महान व्यंग को पढने वाले आप सब महान पाठकों की जय. 
महान टिप्पणीकारों की जय.  

3 comments:

कविता वाचक्नवी said...

राजनेता जो नाटक न कर लें, वह कम। मनमोहन सिंह तथाकथित पढ़ा लिखा हो कर भी बेवकूफ़ प्रधानमन्त्री साबित हुआ है.

Udan Tashtari said...

जय हो!!

राज भाटिय़ा said...

भाई हमे कविता जी की टिपण्णी बहुत पसंद आई, ओर यह है भी १००% सच.
धन्यवाद

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